Kahaniya- Best Stories for kids in Hindi

पढ़िए अपनी मनपसंद हिंदी kahaniya, परियों की कहानियां , cinderella ki kahaniya, Baalveer ki Kahaniya !

bhoot ki kahani


Hindi kahaniya baccho ke liye dekhiye lalchi padosan ki kahani

Mahadevi Verma ki Kahaniya

Mahadevi Verma ne kai lokpriye kahniya likhi hai jime se ek Kahani gillu hai. yeh kahani Mahadevi ki paltu gilheri ke bare mai hai

गिल्लू

सोनजुही में आज एक पीली कली लगी है। इसे देखकर अनायास ही उस छोटे जीव का स्मरण हो आया, जो इस लता की सघन हरीतिमा में छिपकर बैठता था और फिर मेरे निकट पहुँचते ही कंधे पर कूदकर मुझे चौंका देता था। तब मुझे कली की खोज रहती थी, पर आज उस लघुप्राण की खोज है।

परंतु वह तो अब तक इस सोनजुही की जड़ में मिट्टी होकर मिल गया होगा। कौन जाने स्वर्णिम कली के बहाने वही मुझे चौंकाने ऊपर आ गया हो!

अचानक एक दिन सवेरे कमरे से बरामदे में आकर मैंने देखा, दो कौवे एक गमले के चारों ओर चोंचों से छूआ-छुऔवल जैसा खेल खेल रहे हैं। यह काकभुशुंडि भी विचित्र पक्षी है – एक साथ समादरित, अनादरित, अति सम्मानित, अति अवमानित।

हमारे बेचारे पुरखे न गरूड़ के रूप में आ सकते हैं, न मयूर के, न हंस के। उन्हें पितरपक्ष में हमसे कुछ पाने के लिए काक बनकर ही अवतीर्ण होना पड़ता है। इतना ही नहीं हमारे दूरस्थ प्रियजनों को भी अपने आने का मधु संदेश इनके कर्कश स्वर में ही देना पड़ता है। दूसरी ओर हम कौवा और काँव-काँव करने को अवमानना के अर्थ में ही प्रयुक्त करते हैं।

मेरे काकपुराण के विवेचन में अचानक बाधा आ पड़ी, क्योंकि गमले और दीवार की संधि में छिपे एक छोटे-से जीव पर मेरी दृष्टि रफ़क गई। निकट जाकर देखा, गिलहरी का छोटा-सा बच्चा है जो संभवतः घोंसले से गिर पड़ा है और अब कौवे जिसमें सुलभ आहार खोज रहे हैं।

काकद्वय की चोंचों के दो घाव उस लघुप्राण के लिए बहुत थे, अतः वह निश्चेष्ट-सा गमले से चिपटा पड़ा था।

सबने कहा, कौवे की चोंच का घाव लगने के बाद यह बच नहीं सकता, अतः इसे ऐसे ही रहने दिया जावे।

परंतु मन नहीं माना -उसे हौले से उठाकर अपने कमरे में लाई, फिर रूई से रक्त पोंछकर घावों पर पेंसिलिन का मरहम लगाया।

रूई की पतली बत्ती दूध से भिगोकर जैसे-तैसे उसके नन्हे से मुँह में लगाई पर मुँह खुल न सका और दूध की बूँदें दोनों ओर ढुलक गईं।

कई घंटे के उपचार के उपरांत उसके मुँह में एक बूँद पानी टपकाया जा सका। तीसरे दिन वह इतना अच्छा और आश्वस्त हो गया कि मेरी उँगली अपने दो नन्हे पंजों से पकड़कर, नीले काँच के मोतियों जैसी आँखों से इधर-उधर देखने लगा।

तीन-चार मास में उसके स्निग्ध रोए, झब्बेदार पूँछ और चंचल चमकीली आँखें सबको विस्मित करने लगीं।

हमने उसकी जातिवाचक संज्ञा को व्यक्तिवाचक का रूप दे दिया और इस प्रकार हम उसे गिल्लू कहकर बुलाने लगे। मैंने फूल रखने की एक हलकी डलिया में रूई बिछाकर उसे तार से खिड़की पर लटका दिया।

वही दो वर्ष गिल्लू का घर रहा। वह स्वयं हिलाकर अपने घर में झूलता और अपनी काँच के मनकों -सी आँखों से कमरे के भीतर और खिड़की से बाहर न जाने क्या देखता-समझता रहता था। परंतु उसकी समझदारी और कार्यकलाप पर सबको आश्चर्य होता था।

जब मैं लिखने बैठती तब अपनी ओर मेरा ध्यान आकर्षित करने की उसे इतनी तीव्र इच्छा होती थी कि उसने एक अच्छा उपाय खोज निकाला।

वह मेरे पैर तक आकर सर्र से परदे पर चढ़ जाता और फिर उसी तेजी से उतरता। उसका यह दौड़ने का क्रम तब तक चलता जब तक मैं उसे पकड़ने के लिए न उठती।

कभी मैं गिल्लू को पकड़कर एक लंबे लिफ़ाफ़े में इस प्रकार रख देती कि उसके अगले दो पंजों और सिर के अतिरिक्त सारा लघुगात लिफ़ाफ़े के भीतर बंद रहता। इस अद्भुत स्थिति में कभी-कभी घंटों मेज़ पर दीवार के सहारे खड़ा रहकर वह अपनी चमकीली आँखों से मेरा कार्यकलाप देखा करता।

भूख लगने पर चिक-चिक करके मानो वह मुझे सूचना देता और काजू या बिस्कुट मिल जाने पर उसी स्थिति में लिफ़ाफ़े से बाहर वाले पंजों से पकड़कर उसे कुतरता रहता।

फिर गिल्लू के जीवन का प्रथम बसंत आया। नीम-चमेली की गंध मेरे कमरे में हौले-हौले आने लगी। बाहर की गिलहरियां खिड़की की जाली के पास आकर चिक-चिक करके न जाने क्या कहने लगीं?

गिल्लू को जाली के पास बैठकर अपनेपन से बाहर झाँकते देखकर मुझे लगा कि इसे मुक्त करना आवश्यक है।

मैंने कीलें निकालकर जाली का एक कोना खोल दिया और इस मार्ग से गिल्लू ने बाहर जाने पर सचमुच ही मुक्ति की साँस ली। इतने छोटे जीव को घर में पले कुत्ते, बिल्लियों से बचाना भी एक समस्या ही थी।

आवश्यक कागज़ -पत्रों के कारण मेरे बाहर जाने पर कमरा बंद ही रहता है। मेरे कालेज से लौटने पर जैसे ही कमरा खोला गया और मैंने भीतर पैर रखा, वैसे ही गिल्लू अपने जाली के द्वार से भीतर आकर मेरे पैर से सिर और सिर से पैर तक दौड़ लगाने लगा। तब से यह नित्य का क्रम हो गया।

मेरे कमरे से बाहर जाने पर गिल्लू भी खिड़की की खुली जाली की राह बाहर चला जाता और दिन भर गिलहरियों के झुंड का नेता बना हर डाल पर उछलता-कूदता रहता और ठीक चार बजे वह खिड़की से भीतर आकर अपने झूले में झूलने लगता।

मुझे चौंकाने की इच्छा उसमें न जाने कब और कैसे उत्पन्न हो गई थी। कभी फूलदान के फूलों में छिप जाता, कभी परदे की चुन्नट में और कभी सोनजुही की पत्तियों में।

मेरे पास बहुत से पशु-पक्षी हैं और उनका मुझसे लगाव भी कम नहीं है, परंतु उनमें से किसी को मेरे साथ मेरी थाली में खाने की हिम्मत हुई है, ऐसा मुझे स्मरण नहीं आता।

गिल्लू इनमें अपवाद था। मैं जैसे ही खाने के कमरे में पहुँचती, वह खिड़की से निकलकर आँगन की दीवार, बरामदा पार करके मेज़ पर पहुंच जाता और मेरी थाली में बैठ जाना चाहता। बड़ी कठिनाई से मैंने उसे थाली के पास बैठना सिखाया जहां बैठकर वह मेरी थाली में से एक-एक चावल उठाकर बड़ी सफ़ाई से खाता रहता। काजू उसका प्रिय खाद्य था और कई दिन काजू न मिलने पर वह अन्य खाने की चीजें या तो लेना बंद कर देता या झूले से नीचे फेंक देता था।

उसी बीच मुझे मोटर दुर्घटना में आहत होकर कुछ दिन अस्पताल में रहना पड़ा। उन दिनों जब मेरे कमरे का दरवाजा खोला जाता गिल्लू अपने झूले से उतरकर दौड़ता और फिर किसी दूसरे को देखकर उसी तेज़ी से अपने घोंसले में जा बैठता। सब उसे काजू दे आते, परंतु अस्पताल से लौटकर जब मैंने उसके झूले की सफ़ाई की तो उसमें काजू भरे मिले, जिनसे ज्ञात होता था कि वह उन दिनों अपना प्रिय खाद्य कितना कम खाता रहा।

मेरी अस्वस्थता में वह तकिए पर सिरहाने बैठकर अपने नन्हे-नन्हे पंजों से मेरे सिर और बालों को इतने हौले-हौले सहलाता रहता कि उसका हटना एक परिचारिका के हटने के समान लगता।

गरमियों में जब मैं दोपहर में काम करती रहती तो गिल्लू न बाहर जाता न अपने झूले में बैठता। उसने मेरे निकट रहने के साथ गरमी से बचने का एक सर्वथा नया उपाय खोज निकाला था। वह मेरे पास रखी सुराही पर लेट जाता और इस प्रकार समीप भी रहता और ठंडक में भी रहता।

गिलहरियों के जीवन की अवधि दो वर्ष से अधिक नहीं होती, अतः गिल्लू की जीवन यात्रा का अंत आ ही गया। दिन भर उसने न कुछ खाया न बाहर गया। रात में अंत की यातना में भी वह अपने झूले से उतरकर मेरे बिस्तर पर आया और ठंडे पंजों से मेरी वही उँगली पकड़कर हाथ से चिपक गया, जिसे उसने अपने बचपन की मरणासन्न स्थिति में पकड़ा था। पंजे इतने ठंडे हो रहे थे कि मैंने जागकर हीटर जलाया और उसे उष्णता देने का प्रयत्न किया। परंतु प्रभात की प्रथम किरण के स्पर्श के साथ ही वह किसी और जीवन में जागने के लिए सो गया।

उसका झूला उतारकर रख दिया गया है और खिड़की की जाली बंद कर दी गई है, परंतु गिलहरियों की नयी पीढ़ी जाली के उस पार चिक-चिक करती ही रहती है और सोनजुही पर बसंत आता ही रहता है।

सोनजुही की लता के नीचे गिल्लू को समाधि दी गई है – इसलिए भी कि उसे वह लता सबसे अधिक प्रिय थी – इसलिए भी कि उस लघुगात का, किसी वासंती दिन, जुही के पीताभ छोटे फूल में खिल जाने का विश्वास, मुझे संतोष देता है।

Hindi Movies

kahaniya

गुरु दक्षिणा – Pario ki kahaniya

एक बार एक मशष्य नेववनम्रतापव ू कष अपनेग ु रु जी सेपछ ू ा-‘ग ु रु जी,क ु छ लोग कहतेहैंकक जीवन एक सींघर्षहै,क ु छ अन्य कहतेहैंकक जीवन एक खेल हैऔर क ु छ जीवन को एक उत्सव की सींज्ञा देतेहैं| इनमेंकौन सह है?’ग ु रु जी नेतत्काल बड़ेह धयै पष व ू कष उत्तर ददया-‘पत्र ु,क्जन्हेंग ु रु नह ीं ममला उनके मलए जीवन एक सींघर्षहै; क्जन्हेंग ु रु ममल गया उनका जीवन एक खेल हैऔर जो लोग ग ु रु द्वारा बतायेगए मागषपर चलनेलगतेहैं,मात्र वेह जीवन को एक उत्सव का नाम देनेका साहस ज ु टा पातेहैं|’यह उत्तर सन ु नेकेबाद भी मशष्य परू तरह सेसींतु ष्ट न था| ग ु रु जी को इसका आभास हो गया |वेकहनेलगे- ‘लो,तु म्हेंइसी सन्दभषमेंएक कहानी सन ु ाता हूाँ| ध्यान सेसन ु ोगेतो स्वयींह अपनेप्रश्न का उत्तर पा सकोगे|’ उन्होंनेजो कहानी सन ु ाई,वह इस प्रकार थी-एक बार की बात हैकक ककसी ग ु रुक ु ल मेंतीन मशष्यों नेंअपना अध्ययन सम्पर् ू षकरनेपर अपनेग ु रु जी सेयह बतानेकेमलए ववनती की कक उन्हेंग ु रुदाक्षक्षर्ा में, उनसेक्या चादहए |ग ु रु जी पहलेतो मींद-मींद मस्ु करायेऔर किर बड़ेस्नेहपव ू कष कहनेलगे-‘मझु ेतु मसेग ु रुदक्षक्षर्ा मेंएक थैला भर के सख ू ी पक्त्तयाीं चादहए,ला सकोगे?’ वेतीनों मन ह मन बह ु त प्रसन्न ह ु ए क्योंकक उन्हेंलगा कक वेबड़ी आसानी सेअपनेग ु रु जी की इच्छा परू कर सकेंगे|सख ू ी पक्त्तयााँतो जींगल मेंसवषत्र बबखर ह रहती हैं| वेउत्साहपव ू कष एक ह स्वर मेंबोले-‘जी ग ु रु जी, जैसी आपकी आज्ञा |’ अब वेतीनों मशष्य चलते-चलतेएक समीपस्थ जींगल मेंपह ुाँच चक ु ेथे|लेककन यह देखकर कक वहााँपर तो सख ू ी पक्त्तयााँके वल एक मट्ठु ी भर ह थीीं,उनकेआश्चयषका दठकाना न रहा | वेसोच मेंपड़ गयेकक आखखर जींगल सेकौन सख ू ी पक्त्तयाींउठा कर लेगया होगा? इतने मेंह उन्हेंदरू सेआता ह ु आ कोई ककसान ददखाई ददया |वेउसके पास पह ुाँच कर, उससे ववनम्रतापव ू कष याचना करनेलगेकक वह उन्हेंके वल एक थैला भर सख ू ी पक्त्तयाींदेदे|अब उस ककसान नेउनसेक्षमायाचना करतेह ु ए, उन्हेंयह बताया कक वह उनकी मदद नह ींकर सकता क्योंकक उसनेसख ू ी पक्त्तयों का ईंधन के रूप मेंपहलेह उपयोग कर मलया था | अब, वेतीनों, पास मेंह बसेएक गााँव की ओर इस आशा सेबढ़नेलगेथेकक हो सकता है वहााँउस गााँव मेंउनकी कोई सहायता कर सके |वहााँपह ुाँच कर उन्होंनेजब एक व्यापार को देखा तो बड़ी उम्मीद सेउससेएक थैला भर सख ू ी पक्त्तयाींदेनेके मलए प्राथषना करने लगेलेककन उन्हेंकिर सेएकबार ननराशा ह हाथ आई क्योंकक उस व्यापार नेतो, पहलेह , क ु छ पैसेकमानेकेमलए सख ू ी पक्त्तयों केदोनेबनाकर बेच ददए थेलेककन उस व्यापार ने उदारता ददखातेह ु ए उन्हेंएक बढ ू मााँका पता बताया जो सख ू ी पक्त्तयाींएकबत्रत ककया करती थी|पर भाग्य नेयहााँपर भी उनका साथ नह ीं ददया क्योंकक वह बढ ू मााँतो उन पक्त्तयों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओर्धधयााँबनाया करती थी |अब ननराश होकर वेतीनों खाल हाथ ह ग ु रुक ु ल लौट गये|ग ु रु जी नेउन्हेंदेखतेह स्नेहपव ू कष पछ ू ा- ‘पत्र ु ो,लेआयेग ु रुदक्षक्षर्ा ?’तीनों नेसर झक ु ा मलया |ग ुरू जी द्वारा दोबारा पछ ू ेजानेपर उनमेंसेएक मशर्य् कहनेलगा- ‘ग ु रुदेव,हम आपकी इच्छा परू नह ींकर पाये|हमनेसोचा था कक सख ू ी पक्त्तयाींतो जींगल मेंसवषत्र बबखर ह रहती होंगी लेककन बड़ेह आश्चयषकी बात हैकक लोग उनका भी ककतनी तरह सेउपयोग करतेहैं|’ग ु रु जी किर पहलेह की तरह मस्ु करातेह ु ए प्रेमपव ू कष बोले-‘ननराश क्यों होतेहो ?प्रसन्न हो जाओ और यह ज्ञान कक सख ू ी पक्त्तयाींभी व्यथषनह ींह ु आ करतीींबक्कक उनकेभी अनेक उपयोग ह ु आ करतेहैं ; मझु े ग ु रुदक्षक्षर्ा केरूप मेंदेदो |’तीनों मशष्य ग ु रु जी को प्रर्ाम करकेख ु शी-ख ु शी अपने-अपने घर की ओर चलेगये| वह मशष्य जो ग ु रु जी की कहानी एकाग्रधचत्त हो कर सन ु रहा था,अचानक बड़ेउत्साह से बोला-‘ग ु रु जी,अब मझु ेअच्छी तरह सेज्ञात हो गया हैकक आप क्या कहना चाहतेहैं|आप का सींके त, वस्तुतः इसी ओर हैन कक जब सवषत्र सल ु भ सख ू ी पक्त्तयाींभी ननरथषक या बेकार नह ींहोती हैंतो किर हम कै से, ककसी भी वस्तु या व्यक्क्त को छोटा और महत्त्वह न मान कर उसका नतरस्कार कर सकतेहैं?चीींट सेलेकर हाथी तक और सईु सेलेकर तलवार तकसभी का अपना-अपना महत्त्व होता है|’ग ु रु जी भी तुरींत ह बोले-‘हााँ, पत्र ु,मेरेकहनेका भी यह तात्पयषहैकक हम जब भी ककसी सेममलेंतो उसेयथायोग्य मान देनेका भरसक प्रयास करेंताकक आपस मेंस्नेह, सद्भावना,सहानभ ु न ूत एवींसदहष्र् ुता का ववस्तार होता रहेऔर हमारा जीवन सींघर्षके बजाय उत्सव बन सके | दसू रे,यदद जीवन को एक खेल ह माना जाए तो बेहतर यह होगा कक हम ननववषक्षेप,स्वस्थ एवींशाींत प्रनतयोधगता मेंह भाग लें और अपनेननष्पादन तथा ननमाषर् को ऊीं चाई केमशखर पर लेजानेका अथक प्रयास करें |’अब मशष्य परू तरह सेसींतु ष्ट था | अींततः,मैंयह कहना चाहती हूाँकक यदद हम मन, वचन और कमष- इन तीनों ह स्तरों पर इस कहानी का मक ू याींकन करें, तो भी यह कहानी खर ह उतरेगी |सब केप्रनत पव ू ाषग्रह से मक् ुत मन वाला व्यक्क्त अपनेवचनों सेकभी भी ककसी को आहत करनेका दः ुसाहस नह ीं करता और उसकी यह ऊजाषउसके परु ु र्ाथषके मागषकी समस्त बाधाओींको हर लेती है |वस्तुतः,हमारेजीवन का सबसेबड़ा ‘उत्सव’परु ु र्ाथषह होता है-ऐसा ववद्वानों का मत है|

Hindi Stories

[gd_listings title=” post_type=’gd_hindi’ category=’0′ related_to=” tags=” post_author=” sort_by=” title_tag=’h3′ layout=’h3′ post_limit=’16’ post_ids=” add_location_filter=’true’ show_featured_only=’false’ show_special_only=’false’ with_pics_only=’false’ with_videos_only=’false’ show_favorites_only=’false’ favorites_by_user=” use_viewing_post_type=’false’ hide_if_empty=’false’ view_all_link=’false’ with_pagination=’true’ top_pagination=’false’ bottom_pagination=’true’ pagination_info=” country=” region=” city=” neighbourhood=” ]
jadui kahaniya

cinderella ki kahani